अल्फाज़! कुछ भी बयां करने के लिए हम इनका सहारा लेते। ये कई तरह के एहसासों से घुली होती है। मगर कभी कभी कुछ अल्फाज़ अनकहे से, अनसुने से, समय के मारे, हमारे अन्दर ही हम दबा देते है।
यूं ही राह चलते शब्दों से मिल जाती हू,
फिर उन्हें अपने एहसासों से पीरों जाती हू।
जो उनसे ना बयां कर पाती हू,
वो कुछ अनकहे से अनसुने से अल्फाज खुद को ही सुनाए जाती हू।
कभी तो एक मोड आएगा,
जहा उनसे ये अनकहे अल्फाज बयां कर सकूंगी,
बस इसी उम्मीद में इन शब्दों से मिलती जाती हू,
और इन्हे एहसासों से पीरोंए जाती हू।
सही है या गलत,
अच्छे है या बुरे,
इन सब से ही परे,
बस उन अनकहे अल्फाजों को पीरोए ही जाती हू।
तो ये कुछ मेरे लिखें शब्दों का मायाजाल। उम्मीद है आप सभी को जरूर पसंद आएगें।

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